समय, एक न दिखने वाली चीज़ है।
समय को छुआ नहीं जा सकता। न रंग, न गंध, न आकार। बड़ों के लिए भी, ठीक से सोचें तो, यह एक अजीब-सा अस्तित्व है।
बच्चे के लिए तो और भी अजीब। हम बड़े लोग, उनके भीतर सब क्या-कुछ चलता है — वहाँ तक नहीं पहुँच पाते; पर इतना तो दिख ही जाता है — बच्चे की दुनिया के अंदर, चीज़ें और मतलब, अपने ही ढंग से नज़र आते हैं। और उन सब में, "समय" वही एक है — जिसे बड़ों की समझदारी वाली भाषा में रखकर देने चलें, तो सबसे ज़्यादा फिसल जाता है।
ज़रूरत है एक ऐसे औज़ार की — जो "समय" जैसी अमूर्त चीज़ को, ऐसे आकार में बदल दे जिसे दो लोग एक-साथ हाथ में थाम सकें। वह औज़ार है घड़ी। एक ऐसी मौजूदगी, जो अपना ही आकार उधार देती रहती है — ताकि हर इंसान के भीतर बहता अलग-अलग "समय", आख़िरकार एक-दूसरे के पास तक पहुँच सके।